आखिर क्युं जरुरत बेटी बचाने की


जब देश का प्रधानमंत्री लाल किले की प्राचीर से बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ की बात करता है तो वो हमसे अपील करता है कन्या भ्रूण हत्या रोकने की बेटियों को जन्म देने की उन्हें बचाने की देश की मुख्य धारा में लाने की।
किन्तु एक बेटी के मन में कभी कभी तो ये सवाल उठता ही होगा.....

आज जरुरत क्यूँ है बोलो
तुमको मुझे बचाने की
तुमको तो आदत सी है ना
कोख में मुझे मिटाने की

तुमको तो बेटे थे प्यारे
उनसे मन भर आया है
या फिर अब तक कुलदीपक का
ब्याह नहीं हो पाया है
चिंता शायद सता रही
वंश बेल मुरझाने की

तुमको तो आदत सी है ना
कोख में मुझे मिटाने की

तुमने खुशियाँ नहीं मनायी
मेरे पैदा होने की
बोझ समझ कर मुझको पाला
मज़बूरी थी ढोने की
फिर आज जरुरत क्या है तुमको
मेरी जान बचाने की

तुमको तो आदत सी है ना
कोख में मुझे मिटाने की

मुझको चूल्हा चौका बर्तन
और बेटे को ज्ञान मिला
मैं भी तो पढ़-लिख सकती थी
मुझको क्यूँ अज्ञान मिला
फिर आज जरुरत क्यूँ लगती है
तुमको मुझे पढ़ाने की

तुमको तो आदत सी है ना
कोख में मुझे मिटाने की

जो फर्क करे संतानो में मै
उस दामन में क्यूँ आऊँ
बेटी बोझ समझ कर पाले
उस आँगन में क्यूँ जाउँ
मुझको भी अधिकार चाहिए
आज़ादी मुस्काने की

तुमको तो आदत सी है ना
कोख में मुझे मिटाने की

अस्तित्व तुम्हारा बचा रहे
इसलिये बचाना है मुझको ?
तेरी पीढ़ी पढ़ जाये
इसलिये पढ़ाना है मुझको ?
या फिर तुमको सता रही है
चिंता खुद मिट जाने की

तुमको तो आदत सी है ना
कोख में मुझे मिटाने की

आज जरुरत क्यूँ है तुमको
मेरी जान बचाने की
तुमको तो आदत सी है ना
कोख में मुझे मिटाने की

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