बारिश

याद करता हूँ वह वक़्त जब बारिश की पहली बूँद मुझे बताती थी की छाता खोलने का वक़्त आ गया है.और जब मैं छाता खोलता था तुम मुझे रोक लेती थी. और हम यूँ ही चलते चले जाते थे उस रास्ते पे जहां सब भीगा होता था. अब पता नहीं क्यों यह संतुलन है. मैं छाता खोलता हूँ तुम उसके अंदर मेरे साथ आ जाती हो. दिलासा देता रहता हूँ खुद को की कम से कम साथ तो हो हम दोनों भीगे न हों तो क्या हुआ. रास्ता भी सूखा अब लगने लगा है जैसे बारिश कभी हुई ही न हो. और चिंता है मुझे की एक दिन ऐसा भी शायद हो जब दो छाते हों और फिर अंत में दो रास्ते. शायद फिर कभी बारिश न हो! सोचता हूँ एक दिन एक आंधी आये और मेरा छाता उड़ा ले जाए और हमारे पास एक दुसरे का सहारा हो किसी चीज़ की आड़ नहीं. रास्ता फिर गीला हो जाए और हम दोनों फिर भीग जाएँ ज़िन्दगी की बारिश में.       ---विजय कुमार पाठक।

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