पंक्तियाँ

बहते पानी में गुनगुनी
धुप सी चमकती हो तुम,
और मैं किसी मछली सा
घबराया घूमता रहता हूँ।
              -- अंकुर डोबरियाल


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तू किसी रेल सी गुज़रती है,
मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ।
             -- दुष्यंत कुमार 

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