कुछ दोस्त छूटे, तो कुछ रिश्ते टूटे |
कइयों के तो परिवार भी छूटे |
मुखौटे भी हटे हैं यहाँ तो कई,
अपने और परायों की पहचान हो गई |
समय बहुत ही कठिन था,
मन कशमकश में लीन था |
माना की सँभलने के लिए गिरना जरुरी होता है,
पर औरों को अपने साथ गिराना भी मुझे मंज़ूर कहाँ था |
ये साल कुछ इस क़दर झिंझोड़ गया,
नया सवेरा ही नई उम्मीद बन गया |
भीगी पलकों से विदा करते हैं अब इस साल को,
शायद ये हमे बेहतर इंसान कर गया |
- तुषारिका
No comments :
Post a Comment